इस कोरोना के दौर में आखिर क्यों बढ़ रहा है इस कड़कनाथ मुर्गे की मांग जाने पूरी

कड़कनाथ-  दूसरी प्रजातियो के चिकन के मुकाबले कड़कनाथ में पोषक तत्व काफी ज़ादा मात्रा में होता है और प्रोटीन की मात्रा भी अपेछाकृत कही ज़ादा होती है अगर हम दुसरे चिकेन से तुलना करे तो.. कड़कनाथ चिकन में अलग  स्वाद के साथ साथ औषधीय गुण भी होता है।  तो आइये हम जानते है की आखिर इस कोरोना के दौर में कड़कनाथ मुर्गे की इतनी मांग क्यों बढ़  गयी है टी आईये जान लेते है कड़कनाथ के इतिहास के बारे में –

 

कौन है कड़कनाथ ?

कड़कनाथ मुर्गे को स्थानीय जुबान में कालामासी कहा जाता है. इसकी त्वचा और पंखों से लेकर मांस तक का रंग काला होता है. इसमें अधिक मात्रा में प्रोटीन के साथ ही औषधीय गुण भी होते हैं. सफेद चिकन के मुकाबले इसमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी काफी कम होता है.

फैट कम होने से हृदय और डायबिटीज रोगियों के लिए यह चिकन बहुत ही फायदेमंद माना जाता है. कड़कनाथ चिकन प्रमुख रूप से मध्‍यप्रदेश और छत्‍तीसगढ़ में पाया जाता है. लेकिन अब यह मुर्गा देश के कई हिस्‍सों जैसे तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और महाराष्‍ट्र में पाला जाता है. अब इस मुर्गे की डिमांड पूरे देश में होने लगी है.

कोविड -19  के ज़ारी प्रकोप के वजह से कड़कनाथ की मांग एकदम से बढ़  गयी है।  कड़कनाथ मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले की पारंपरिक मुर्गा प्रजाति कड़कनाथ की मांग इसके पोषक तत्वों के कारण देश भर में बढ़ रही है. लेकिन महामारी के कहर की वजह से नियमित यात्री ट्रेनों के परिचालन पर ब्रेक लगने से इसके जिंदा पक्षियों के अंतरप्रांतीय कारोबार पर बुरा असर पड़ा है

झाबुआ का कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) अपनी हैचरी के जरिये कड़कनाथ की मूल नस्ल के संरक्षण और इसे बढ़ावा देने की दिशा में काम करता है. केवीके के प्रमुख डॉ. आईएस तोमर ने रविवार को “पीटीआई-भाषा” को बताया कि कोविड-19 के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान परिवहन के अधिकांश साधन बंद होने के चलते कड़कनाथ के चूजों की आपूर्ति पर स्वाभाविक रूप से असर पड़ा था.

 

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लेकिन लॉकडाउन खत्म होने के बाद इनकी मांग बढ़ गयी है. उन्होंने बताया, “देश भर के मुर्गा पालक अपने निजी वाहनों से कड़कनाथ के चूजे लेने हमारी हैचरी पहुंच रहे हैं. पिछले महीने हमने करीब 5,000 चूजे बेचे थे और हमारी हैचरी की मासिक उत्पादन क्षमता इतनी ही है.”

तोमर ने बताया की हमारे हैचरी में कड़कनाथ के चूज़े का स्टॉक खत्म हो गया है इन दिनों चूज़ों की मांग इतनी ज़ादा है की अगर आप आज कोई नया आर्डर बुक करेंगे तो हम उसे 2 महीने के बाद ही आपूर्ति कर सकेंगे।

उन्होंने बताया की कड़कनाथ को लेकर कोई वैज्ञानिक अध्यन नहीं किया गया है लेकिन बात पहले से स्थापित तथ्य है की कड़कनाथ दूसरी प्रजातियो के चिकन के मुकाबले कड़कनाथ के काले रंग के मांश एमए चर्बी और कोलोस्ट्राल काफी काम होता है, जबकि इसमें प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत  काफी ज्यादा होता है इसमें अलग स्वाद के साथ साथ औषधीय गुण भी होते है.

इसी बीच झाबुआ जिले में कड़कनाथ से जुडी एक सहकारी संस्था के प्रमुख ने बताया की कोरोना काम में इस मुर्गे की मांग में काफी इज़ाफ़ा हुआ है और रेगुलर यात्री ट्रैन नहीं चलने के कारड़ दुसरे राज्यों को आपूर्ति नहीं हो पा रहा है.

इन्होने बताया की कोविद-19  के प्रकोप से पहले है, हम ट्रैन का तय भाड़ा भर कर पूरे देश में कड़कनाथ को जिन्दा चूज़े भेजा करते थे. इन्हे छेद वाली हवादार पैकिंग में बंद किया जाता  है ताकि पूरे यात्रा में वो ज़िंदा रह सके.

 

900-1000 रुपये किलो बिकता है मीट, 50 रुपये का अंडा

कड़कनाथ

इस प्रजाति के मुर्गी के अंडे काफी महंगे होते हैं. इसका एक अंडा करीब 50 रुपये में बिकता है जबिक एक कड़कनाथ मुर्गे की कीमत 900 से 1200 प्रति किलो रुपये तक होती है. जबकि मुर्गी की कीमत 3000 से लेकर 4000 के बीच होती है.

क्या है जीआई सर्टिफिकेशन?

किसी निश्चित क्षेत्र विशेष के उत्पादों को दिया जाने वाले पहचान को जियोग्रॉफिल इंडीकेशन सर्टिफिकेशन दिया जाता है. जैसे चंदेरी की साड़ी, कांजीवरम की साड़ी, दार्जिलिंग चाय और मलिहाबादी आम समेत अब तक करीब 270 उत्पादों को जीआई मिल चुका है.

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धन्यवाद 🙂

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