यूपी का सबसे बड़ा डॉन कौन है। UP Ka Sabse Bada DON Kaun Hai 2020 –

यूपी का सबसे बड़ा डॉन कौन है- आप सबको   जहातक पता ही होगा की यूपी हिंदुस्तान का सबसे बड़ा राज्य है और सबसे प्रमूख भी है कोउक। सबसे प्रमुख इसलिए भी है की दिल्ली की कुर्सी इसी राज्य से होकर हमेशा निकलती है यानि जिसने भी दिल्ली की गद्दी पर बैठना है उसे यूपी की सत्ता को पूरी तरह से हाथ में लेना पड़ेगा।

आज हम किसी राजनीत की बात  नहीं करने वाले है आज हम बात करेंगे की उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दिन कौन है, क्या वो जिन्दा है, क्या वो मर गया, या अगर जिन्दा है तो आखिर कहा है।

तो देर किस बात की आप चाय बिस्कुट लेकर बैठ जाइये और पूरा पढ़ कर अपने जनरल नॉलेज को बड़ा लीजिये-

यूपी का सबसे बड़ा डॉन कौन है- श्री प्रकाश शुक्ला 

कहानी है यूपी के उस डॉन की, जो अपराध और ताकत की सीढ़ियां इस तेजी से चढ़ा, जिस तेजी से GTA वाइस सिटी के मिशन पूरे किए जाते हैं. बहन को छेड़ने वाले का मर्डर करके वह बदमाश बना. फिर कई नेताओं और बदमाशों का काम लगा के कच्ची उम्र में बड़ी हैसियत बना ली. एक दौर में यूपी के अखबार उसी की खबरों से रंगे होते थे. लखनऊ के हर नुक्कड़, चाय की दुकान और पान के ठीहों पर उसी की बातें होती थीं. लेकिन तब हद हो गई, जब उसने प्रदेश के चीफ मिनिस्टर कल्याण सिंह की सुपारी ले ली. इस सुपारी की कीमत थी 6 करोड़ रुपये.

चलिए हम आपको पूरी कहानी सुरु से बाताते है……

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उस लड़के का नाम है श्री प्रकाश शुक्ला गोरखपुर के एक छोटे से गाव  में उड़के बाप स्कूल में मास्टर  थे. पिता के मास्टर होंने के नाते उनके पास  उस टाइम के हिसाब से काफी अच्छा पैसा था और पैसा  होने के नाते खुराक भी अच्छी थी तो वो पहलवानी में निकल गया और अखाड़े में उसने अपने आपको झोक दिया और खुश ही दिनों में उसने अच्छा नाम कमा लिया लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में पहली बार नाम उसका आया जब वो मात्र २० साल का था. साल था 1993 . राकेश तिवारी नाम ने लफंगे ने उसकी बहन को देख कर सीटी बज़ा दी.  श्री प्रकश ने उसे तत्काल  बड़ी ही बेरहमी से मार डाला और तत्काल पुलिस से बचने के लिए बैंककॉक भाग गया.

लौटा तो उसके मुंह में खून लग चुका था और उसे ज्यादा की दरकार थी. बिहार में मोकामा के सूरजभान में उसे गॉडफादर मिल गया. धीरे-धीरे उसने अपना एंपायर बिल्ड किया और यूपी, बिहार, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और नेपाल में सारे गैरकानूनी धंधे करने लगा. उसने फिरौती के लिए किडनैपिंग, ड्रग्स और लॉटरी की तिकड़म से लेकर सुपारी किलिंग तक में हाथ डाल दिया. एक अंदाजे के मुताबिक, अपने हाथों से उसने करीब 20 लोगों की जानें लीं.

नवाबो वाले शौक-  बदमाशी भी, अयाशी भी और रंगबाज़ी भी

सायद आपको यकीन नहीं होगा की वो बदमाशी में भी सबसे नंबर एक था और अयाशी में उसने से भी बढ़  चढ़ कर था और इसी आदत ने लास्ट ने उसका ही काम लगा दिया, उसकी पसंद भी काफी आला दर्ज़े की थी , महंगी कॉलगर्ल्स, बड़े होटल, मसाज पार्लर, सोने की जंजीरें और तेज भागने वाली कारें और ऊपर से फ़िल्मी आदते। दोस्तों के सामने डायलॉग  मारता रहता था, उस दौर में भी सेल फ़ोन का बहुत बड़ा दीवाना था और लोगो से डींग मारता था की उसके सिर्फ फ़ोन के ख़र्चे ही 5000 रुपये है वो भी रोज़ाना।

जाहिर है, जिस आर्थिक बैकग्राउंड से वह आता था, पैसे का आकर्षण उसके लिए सहज था.

रंगबाज़ी और बदमाशी अब उसके खून खून में बस चुकी थी लेकिन  उसके आड़े नहीं आयी, इसलिए वो अबतक शान शौकत वाली जिंदगी जी रहा था. लेकिन उसे अब और चाइये था कुएकी बाघ के मुँह में तो पहले से ही खून लग चुका था.. और वो अब बड़े खुराक में था. 

लेकिन उसको  ए  एहसास था की यूपी में काफी बड़े बड़े माफिया है जी उसे नौसिखिया से ज्यादा नहीं समझेंगे। उसनहे अपने स्टाइल  यानी ठोंक पीट कर ही नीचे लाने पड़ेगा। उसने ए  तय कर लिया की एक एक  एक कर हर बड़े आदमी का काम लगाएगा जो उसे पैसे दे सके. 

विधायक को लखनऊ में बीच रस्ते गोलियों से भून दिया

यूपी में क्राइम बढ़ता ही जा रहा था और उसी बीच महराजगंज के लक्ष्मीपुर के विधायक वीरेंद्र शाही। 1997 की शुरुआत में ही लखनऊ के बीच सहर में उसे गोलियों से भून दिया। हल्ला होगा भाई, की एक नए लड़के ने दाहि को बीच रस्ते में ही पेल दिया इसके बाद पुराने माफियो की भी फटने लगी की इसने जब विधायक को बीच रोड पे मार दिया तो फिर हम कौन होते है और इसी वजह से इसके रास्ते में कोई माफ़ी ग्रुप नहीं आया।

श्री प्रकाश ने अपनी हिट लिस्ट में दूसरा नाम रखा कल्याण सरकार में कैबिनेट मंत्री हरिशंकर तिवारी का. जो चिल्लूपार विधानसभा सीट से 15 सालों से विधायक थे. जेल से चुनाव जीत चुके थे. श्रीप्रकाश ने अचानक तय किया कि चिल्लूपार की सीट उसे चाहिए. उसने बहुत कम समय में बहुत दुश्मन बना लिए.

यूपी कैबिनेट में वो हरिशंकर तिवारी को छोड़ कर वो पूरी ब्राह्मण लॉबी के करीब था. सोचने वाली बात तो ए  है की वो कल्याण सिंह को अपना निजी दुसमन मानता था.

 

 

उत्तर प्रदेश के STF की रिपोर्ट के मुताबिकु उसके कई बड़े बड़े नेताओ और बिजनेसमैन से रिश्ते थे जैसे , प्रभा द्विवेदी, अमरमणि त्रिपाठी, रमापति शास्त्री, मार्कंडेय चंद, जयनारायण तिवारी, सुंदर सिंह बघेल, शिवप्रताप शुक्ला, जितेंद्र कुमार जायसवाल, आरके चौधरी, मदन सिंह, अखिलेश सिंह और अष्टभुजा शुक्ला जैसे नेताओं से उसके रिश्ते थे.

यूपी का सबसे बड़ा डॉन-  बिहार के बाहुबली मंत्री का मर्डर

उसटाइम बिहार सरकार में के बहुबलि मंत्री थे जिसका नाम था बृज बिहारी प्रसाद।यूपी के आखिरी छोर तक उनका सिक्का चलता था  13 जून 1998 को वह इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के सामने वह अपनी अपनी लाल बत्ती कार से उतरे ही थे कि एके-47 से लैस 4 बदमाश उन्हें गोलियों से गुड आफ्टरनून कह के फरार हो गए. और उनकी मौके पर ही मौत हो गयी

 

इस कत्ल के साथ श्रीप्रकाश का मैसेज साफ था, कि रेलवे के ठेके को उसके अलावा कोई छू नहीं सकता. कई छुटभइयों बदमाशों को तो उसने दौड़ा दौड़ा कर मारा था.

एक आग जो उसने लगायी थी वो अभी तक ठंडा नहीं हुआ था की  कि यूपी पुलिस को ऐसी खबर मिली कि उनके हाथ पांव फूल गए. श्रीप्रकाश शुक्ला ने यूपी के CM कल्याण सिंह की सुपारी ले ली थी. 6 करोड़ रुपये में सीएम की सुपारी लेने की खबर UP पुलिस की STF के लिए बम गिरने जैसी थी।

 

यूपी का सबसे बड़ा डॉन – हाथ धोकर पीछे पड़ी STF

सुपारी की खबर पा कर अब यूपी STF  की हाथ पैर फूलने के साथ साथ काफी कुछ फूल गया था. क्योकि अब उनका एक मकसद बन गया था श्री प्रकाश शुक्ल को चाइये तो चाइये चाहे जैसे मिले- जिंदा या मुर्दा। पुलिस ने सारे घोड़े दौड़ा लिए. लेकिन कही उसका खबर न मिला

अगस्त 1998  के आखिरी हफ्ते में पुलिस के हाथो अहम् सुराग लगा जिसने पूरे मज़मे में खुसी की लहर  आखिर आ ही गयी और अपनी पूरी पुलिस फोर्स उसके पीछे लगा दिया।

पता चला की दिल्ली के वसंत कुञ्ज में प्रकाश ने एक फ्लैट लिया है. सबको पता था की उसका पूरा धंधा पोरे अंधरे में ही परवान चढ़ता है. शाम का झुटपुटा होते ही वह अपने मोबाइल फोन से कॉल करने लगता.

 

श्रीप्रकाश ने लखनऊ में 105 फ्लैट बनाने वाले एक बिल्डर को अपनी जिंदगी की आखिरी धमकी दी थी. उसकी मांग सीधी थी, ‘हर फ्लैट पर 50 हजार रुपये की रंगदारी.’

 

ए सब करते करते उस से उसकी जिंदगी की सबसे वादी गलती हो गयी. कहा जाता हिअ की उसके पास 14 सिम कार्ड थे. लेकिन पता नहीं क्यों, जिंदगी के आखिरी हफ्ते में उसने एक ही सिम कार्ड से बात की, इस से पुलिस के पूरे महकमे को उसके बारे में पता करना आसान हो गया. 21 सितम्बर लकी एक शाम को वक मुखबिर ने  पुलिस को बताया की अगली सुबह 5 :45  बजे शुक्ला रांची के लिए इंडियन एयरलाइन्स की फ्लाइट लेगा। दिल्ली एयरपोर्ट पर पुलिस फोर्स ने तड़के 3  पूरे एयरपोर्ट को घेर लिया, पर वो नहीं आया.

 

मोहन नगर के पास हुई मुठभेड़- 

काफी रगड़ने के बाद आखिर पलिस वालो की किस्मत रंग लायी और पुलिस वालो की किस्मत ने पलटा खाया। शुक्ल अब अपना फ़ोन इस्तेमाल कर रहा था.

पुलिस को पता चला कि वह वसंत कुंज के अपने ठिकाने से निकलकर अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने गाजियाबाद जाएगा. पुलिस ने उसकी वापसी के समय जाल बिछा दिया. दिल्ली-गाजियाबाद स्टेट हाइवे पर फोर्स लग गई.

 

दोपहर 1.50 बजे उसकी नीली सिएलो कार मोहननगर फ्लाइओवर के पास दिखी तो वहां पुलिस की 5 गाड़ियां तैनात थीं. गाड़ी का नंबर HR26 G 7305 फर्जी था, वह किसी स्कूटर को आवंटित था.

 

इधर से 45 गोलियां चलीं उधर से 14

गाड़ी शुक्ला चला रहा था और अनुज प्रताप सिंह उसके साथ आगे और सुधीर त्रिपाठी पीछे बैठा था. उसे खतरा महसूस हुआ. उसने स्पीड बढ़ाई और पुलिस की पहली और दूसरी गाड़ी को चकमा दे दिया. तभी इंस्पेक्टर वीपीएस चौहान ने अपनी जिप्सी उसकी कार के आगे अड़ा दी. खतरे को सामने देख शुक्ला ने बाएं घूमकर गाड़ी तेजी से यूपी आवास विकास कालोनी की तरफ भगाई. पुलिस ने पीछा किया.

 

यूपी का डॉन कौन है

 

स्टेट हाइवे से एक किलोमीटर हटकर उसे घेर लिया गया. उसने भी रिवॉल्वर निकाल ली. उसने 14 गोलियां दागीं तो पुलिस वालों ने 45. मिनटों में उसका और उसके साथियों का काम लग गया. तारीख थी 22 सितंबर 1998. सवा 2 बजे तक ऑपरेशन बजूका पूरा हो गया था.

शुक्ला का ऐसा अंत नहीं होता अगर वह बदमाशी और रंगबाजी के नशे में चूर न होता. वह राजनीति में उतरना चाहता था और मुमकिन है कि जल्दी ही कानून से पटरी बैठा लेता. उसकी मौत से कुछ महीनों पहले लोग मजाक में कहने लगे थे कि कहीं वह यूपी का मुख्यमंत्री न बन जाए. वैसे श्रीप्रकाश शुक्ला की जिंदगी पर पिक्चर भी बन चुकी है. 2005 में आई थी, अरशद वारसी की ‘सहर.’

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धन्यवाद 🙂

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